Thursday, March 24, 2016

ऑस्कर की दौड़ में भारतीय सिनेमा क्यों है पीछे ?

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दुनिया में प्रति वर्ष भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में सबसे ज्यादा फिल्में बनती है। हिंदी तमिल तेलुगु पंजाबी भोजपुरी सहित अन्य रीजनल फिल्मों को मिला कर 1000 से भी ज्यादा फिल्में एक साल में बनाई जाती है। इसके बावजूद आखिर क्या कारण है की भारतीय सिनेमा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने में न कामयाब रहा है। वहीं देखा जाए तो चीनी और कोरियाई सिनेमा बहुत छोटा होने के बावजूद भारतीय फिल्मों से जुड़ी देखी जाती है।
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क्या कारण है की भारतीय फिल्में सिर्फ भारत और विदेशों में रह रहे भारतीयों तक ही सिमित है। अगर विश्लेषकों की माने तो उनका कहना है की कोरियाई और चाइनीज फिल्म इंडस्ट्री इंटरनेशनल ऑडियंस का ध्यान में रख कर मूवीज बनाते हैं। वहीं भारतीय फिल्म इंडस्ट्री चाहे वो हिंदी हो, तमिल हो या तेलुगु केवल भारतीय दर्शकों के लिए बनाई जाती है, फिर चाहे वो देश में हो या विदेश में।
चाइनीज और कोरियन मूवीज ज्यादा की जा रही पसंद
उल्लेखनीय है की भारत सहित दुनिया भर में विदेशी सिनेमा खासकर हॉलीवुड चाइनीज और कोरियन मूवीज काफी पसंद की जाती है। भारत में इसे अच्छा खासा पसंद किया जाता है। बीते साल ‘स्पाइडर मैन’ और ‘जुरैसिक पार्क’ और ‘अवेंजर्स, फास्ट एंड फ्यूरियस 7 भारत में कई भाषाओं में रीलीज़ हुई थीं और सभी फिल्मों ने रिकार्ड तोड़ अच्छी खासी कमाई की थी।
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भारतीय फिल्में विदेशों में बेस भारतीयों तक ही सिमित रह गई है। ये फिल्में विदेशों में दर्शकों को अपनी तरफ खीच नहीं पाई। बॉलीवुड विशेषज्ञों का मनाना है की हमारे भारतीय दर्शक ही इतने ज्यादा हैं की हमें विदेशी दर्शक ही जरुरत नहीं पड़ती। हमारी टारगेट ऑडियंस इंडियन ऑडियंस ही है इसलिए हम विश्व में सिमित रह गए हैं।
विदेशों में भारतीय सिनेमा को लहराने की जरूरत
दूसरा पक्ष देखा जाए तो भारतीय डायरेक्टर-प्रोड्यूसर्स विदेशी फिल्मों से कम्पटीशन नहीं करना चाहते, क्योंकि उनकी सिनेमा टेक्नोलॉजी हमसे अडवांस है। इसके साथ ही इसमें में आर्थिक नुकसान का डर भी है। इसीलिए कहीं न कहीं ऑस्कर जैसे अवार्ड भी भारतीय फिल्मों को नहीं मिल पाते हैं। बहरहाल, हाल ही के वर्षों में कई भारतीय फिल्में इंग्लिश और अन्य विदेशी भाषाओं में डब करके दिखाई जा रही है, जिसे पसंद भी किया जा रहा है। अंततः कहा जाए तो अब समय आ गया है जब भारतीय सिनेमा को विदेशों में अपना परचम लहराना होगा।

बॉलीवुड का बदलता रुप और सिल्वर स्क्रीन पर आम आदमी की कहानी

पिछले डेढ़ दशक में भारतीय सिनेमा (बॉलीवुड) में बहुत से बदलाव आए हैं। बॉलीवुड ने अपने पारंपरिक धारणा के साथ-साथ अपनी लीक से बाहर हटकर भी काफी बदलावों को अवशोषित किया है। 21वीं सदी ने भारतीय सिनेमा को विषय उन्मुख, गंभीर, व्यंग्य, और कलात्मक जैसी फिल्में बनाने के साथ एक बड़े पैमाने पर बदल दिया है। इन फिल्मों में आम आदमी को सिल्वर स्क्रीन पर चित्रित किया जा रहा है।

इसकी शुरुआत लगान (2001) जैसी फिल्मों से हुई, जिसके बाद स्वदेश, चक दे इंडिया, तारे जमीं पर जैसी फिल्मों ने इस ट्रेंड को फॉलो किया। इसके बाद इनसे भी ज्यादा उग्र विषयों पर फिल्में जैसे कि देव-डी, गैंग्स ऑफ वासेपुर और अन्य फिल्में बनाई गई। यह समय चिह्नित हुआ निर्माता और निर्देशक द्वारा कुछ ऐसे मुद्दे चित्रित करने के लिए जो कि उनके जोखिम उठाने की क्षमता को दर्शा रहे थे। ये जोखिम कभी-कभी वित्तीय आपदा भी साबित हुए।
उल्लेखनीय है कि 1970 के दशक से 2000 तक भारतीय हिंदी सिनेमा का परिवार नाटक, रोमांस, त्रासदी, कार्रवाई, अंडरवर्ल्ड, अपराध आदि जैसी मसाला फिल्मों पर फोकस किया गया था। सुपरस्टार राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना और इसके साथ ही आमिर खान, शाहरुख खान जैसे अभिनेताओं ने इन्ही फिल्मों में अभिनय करके दर्शकों से भारतीय दर्शकों का मनोरंजन किया और स्टारडम हासिल किया।



आशुतोष गोवारिकर को लीक से हटकर फिल्में बनाने का क्रेडिट फिल्म ‘लगान’ के लिए दिया जा सकता है, जिसने ऑस्कर के लिए नामांकित होने के बाद स्थापित और नए डायरेक्टरों के लिए लीक से हटकर सोचने का एक ट्रेंड स्थापित कर दिया। इस ट्रेंड को फिर से आशुतोष की ही फिल्म ‘स्वदेश’ ने जारी रखा। इसके बाद राकेश ओमप्रकाश मेहरा की ‘रंग दे बसंती’, आमिर खान की ‘तारे जमीन पर’, ‘चक दे इंडिया’, ‘देव डी’, ‘डर्टी पिक्चर’, ‘फैशन’, ‘पीपली लाइव’ आदि जैसे फिल्मों ने इस ट्रेंड को जारी रखा।
अमिताभ का सबसे चैलेंजिंग रोल ‘पा’
इस ट्रेंड ने एक और स्थापित डायरेक्टर संजय लीला भंसाली का ‘ब्लैक’ जैसी फिल्म के साथ आने का नेतृत्व किया जिसने दुनिया भर से काफी प्रशंसा बटोरी। आर बाल्की की ‘पा’ आधुनिक हिंदी सिनेमा के ऐसी ही मास्टरपीस थी। इसके अलावा, सुजीत सरकार की विक्की डोनर, जो बॉक्स ऑफिस पर सफल रही थी, उसने अनोखे विषयों पर फिल्म बनाकर यह साबित कर दिया कि विचित्र विषयों को भी भारतीय दर्शकों द्वारा स्वीकार किया जा सकता है।
इसके साथ ही इस आधुनिक समय में दर्शकों ने भी उनकी पहल को हाथों-हाथ लिया और समाज की सच्चाई से मिलती-जुलती फिल्मों को पसंद किया। ‘लाइफ इन अ मैट्रो’, ‘ट्रैफिक सिग्नल’, ‘पीपली लाइव’ जैसे फिल्में भारत के आम आदमी की कहानी बताती है, जो कि 80 और 90 के दशक की फिल्मों से बाहर रखा जाता था। कुल में, यह माना जा सकता है कि अब निर्देशक इस तरह के नए विचारों पर निवेश करने के आदि हो गए हैं और निर्देशक इन विचारों पर काम करने के लिए ज्यादा उत्साहित हैं।


इस दौरान बॉलीवुड के निर्देशकों दशकों से भारतीय दर्शकों को बाकी चीजों से दूर रखने वाली या कह सकते हैं कि भारतीय दर्शकों को सुलाए रखने वाली प्रेम कहानियों, परिवार नाटक, अपराध और पारंपरिक भारतीय त्रासदियों से चित्रित मसाला फिल्मों से बाहर निकल चुके हैं।
सामाजिक मुद्दों पर बना सिनेमा
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि सामाजिक मुद्दों पर कोई भी फिल्म हिंदी सिनेमा के इतिहास में इससे पहले नहीं बनाई गई थी। अंतिम 50 के दशक से 60 के दशक के अंत तक कई तरह के गंभीर विषयों पर फिल्म बनाई गई। सत्यजीत रे की पत्थर पांचाली, श्याम बेनेगल की अंकुर, महबूब खान की मदर इंडिया, ऋत्विक घटक की सुवर्णरेखा, मृणाल सेन की आकाश कुसुम, आदि, तत्कालीन भारतीय सिनेमा की कृतियों थी। ये फिल्में गरीबी, वेश्यावृत्ति, दहेज, और अन्य कदाचार जो कि समकालीन भारतीय समाज में प्रचलित हैं, आम आदमी की उन समस्याओं पर ध्यान केंद्रित थी।


लेकिन, मसाला फिल्मों की प्रवृत्ति 1970 के दशक में हुई और भारतीय सिनेमा को लाभ देने वाली फिल्मों की तरफ मोड़ दिया जिसके कारण भारतीय सिनेमा से धीरे-धीरे उसकी पिच, गुणवत्ता और प्रभाव गायब होने लगा।
संगीत और हिन्दी सिनेमा
यह एक अन्याय होगा अगर भारतीय सिनेमा में संगीत के योगदान का उल्लेख नहीं किया जाएगा। गाने भारतीय फिल्मों के अभिन्न हिस्सा रहे हैं जिसने उन्हें अंतरराष्ट्रीय फिल्मों की तुलना में अलग पहचान दिलाई है। 50 से 70 के दशक ने कई कई प्रतिभाशाली गीतकारों और संगीत निर्देशकों जैसे कि पंचम दा, किशोर कुमार, मोहम्मद रफी, मजरूह सुल्तानपुरी, लता मंगेशकर, शैलेंद्र, आदि को जन्म दिया है।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि 80 दशक के अंत से इसी तरह से इसका आकर्षण हमेशा के लिए लुप्त भी होने लगा। हालांकि हाल ही के वर्षों में, सूफी संगीत, लोक, और हिंदुस्तानी और पश्चिमी संगीत का फ्यूजन की तरह संगीत के विभिन्न प्रकार के बॉलीवुड में पेश किए गए हैं, लेकिन यह लता और रफी की अवधि के आकर्षण को हासिल नहीं कर सके।